बज़्म-ए-उर्दू क़तर का सालाना मुजल्ला “तेवर” का विमोचन और महफ़िल-ए-शेर-ओ-सुख़न

उर्दू की नज़ाकत, हिंदी की मिठास और अदबी जज़्बात से सजी शाम — बज़्म-ए-उर्दू क़तर ने 24 अक्टूबर 2025 को वक़रा स्थित बैसाखी रेस्टोरेंट में अपने सालाना मुजल्ला “तेवर” का भव्य विमोचन और महफ़िल-ए-शेर-ओ-सुख़न का आयोजन किया।


दोहा (क़तर) उर्दू साहित्य के फ़रोग़ में अहम भूमिका निभा रही संस्था बज़्म-ए-उर्दू क़तर ने अपने वार्षिक प्रकाशन “तेवर” के विमोचन के साथ एक यादगार महफ़िल-ए-शेर-ओ-सुख़न का आयोजन किया। कार्यक्रम का आरंभ तिलावत-ए-क़ुरआन से हुआ, जिसके बाद जनरल सेक्रेटरी अहमद अश्फ़ाक़ और नायब जनरल सेक्रेटरी राक़िम आज़मी ने कुशल संचालन किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध कवि और शिक्षाविद् डॉ. नदीम जैलानी दानिश ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्मानित कवयित्री समरीन नदीम समर उपस्थित रहीं। महमान-ए-एज़ाज़ी शेख तनवीर अहमद ने उर्दू की रूह को “क़तर की सरज़मीन पर ज़िंदा” बताते हुए शायराना अंदाज़ में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।

कार्यक्रम के छायाचित्र


कार्यक्रम के छाया चित्र

“तेवर” का विमोचन संपादकों डॉ. बस्मिल आरफ़ी और अहमद अश्फ़ाक़ की देखरेख में सम्पन्न हुआ। संपादकों ने घोषणा की कि अगला अंक “नज़्मों के विशेष संस्करण” के रूप में विश्वस्तरीय कवियों की रचनाओं से सुसज्जित होगा।

महफ़िल में कई जाने-माने शायरों और कवयित्रियों ने अपने शेर पेश किए, जिनमें विनीता राठौड़, मानसी शर्मा, और वंदना राज की प्रस्तुतियाँ विशेष आकर्षण रहीं, जिन्होंने हिंदी-उर्दू की गंगा-जमुनी तहज़ीब को जीवंत किया।

कार्यक्रम के समापन पर डॉ. नदीम जैलानी दानिश ने कहा —
“‘तेवर’ जैसी पत्रिकाएँ उर्दू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला रही हैं। साहित्य सरहदों से परे दिलों को जोड़ने का माध्यम है।”

अंत में पारंपरिक रात्रिभोज और अदबी गुफ़्तगू के साथ यह महफ़िल देर रात तक जारी रही।
यह शाम सिर्फ़ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उर्दू और हिंदी की मोहब्बत का वह पुल बनी जिसने दिलों को और करीब ला दिया।

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