साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिस्पर्धा से निकालकर एक परिवार में रूपांतरित करने का प्रयास है यह सम्मेलन — डॉ. विकास दवे

मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग के साहित्य अकादमी की ऐतिहासिक पहल की समीक्षा - रूचि बाजपेयी शर्मा 

'वीणा की वाणी' विषय पर दो दिवसीय पत्र-पत्रिकाओं का विमर्श 

इंदौर/ इंदौर जो सदैव से साहित्यिक चेतना का जीवंत केंद्र रहा है, वहाँ ‘वीणा की वाणी’ शीर्षक अंतर्गत देशभर से आए साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन एक सार्थक विमर्श का साक्षी बना। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी एवं संस्कृति परिषद द्वारा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित इस आयोजन ने साहित्य, पत्रकारिता और तकनीक के त्रिकोणीय संबंधों पर एक गंभीर और बहुआयामी दृष्टि प्रस्तुत की।

दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ प्रारंभ हुए उद्घाटन सत्र में अनेक विशिष्ट साहित्यकारों और शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति रही। अपने स्वागत उद्बोधन में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने स्पष्ट किया कि साहित्य जगत में सार्थक कार्य के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समरसता की भावना आवश्यक है। उन्होंने इस सम्मेलन को पत्र-पत्रिकाओं को एक सूत्र में पिरोने और उन्हें ‘परिवार’ के रूप में देखने का प्रयास बताया। उनके वक्तव्य में परंपरा और प्रतिबद्धता का सुंदर संतुलन दिखाई दिया।

‘वीणा’ पत्रिका के संपादक राकेश शर्मा ने अपने उद्बोधन में हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि “साहित्य स्थायी पत्रकारिता है और पत्र-पत्रिकाएँ स्थायी साहित्य।” उन्होंने बदलते समय, विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए यह भी रेखांकित किया कि तकनीक सुविधाजनक अवश्य है, परंतु संवेदना का विकल्प नहीं बन सकती।

सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में साहित्यिक पत्रिकाओं के स्वरूप, उनकी चुनौतियों, तकनीकी परिवर्तनों और भविष्य की दिशा पर गहन विचार-विमर्श हुआ। “जो दिखता है वही बिकता है” विषयक सत्र में पत्रिकाओं के लेआउट, आवरण और दृश्यात्मक प्रस्तुति की महत्ता पर बल दिया गया। यह स्पष्ट हुआ कि पठनीयता के साथ-साथ दर्शनीयता भी आज के समय की आवश्यकता है, किंतु इसके साथ सामग्री की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।

तकनीक और परंपरा के अंतर्संबंधों पर चर्चा करते हुए यह निष्कर्ष सामने आया कि तकनीकी प्रगति ने कार्य को सरल और तीव्र बनाया है, किंतु समय-सीमा के दबाव में त्रुटियों की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। इस संदर्भ में ‘Garbage In, Garbage Out’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए गुणवत्तापूर्ण इनपुट की अनिवार्यता पर जोर दिया गया।

कार्टून एवं व्यंग्य विधा पर केंद्रित सत्र ने यह स्थापित किया कि साहित्य केवल गंभीरता का पर्याय नहीं, बल्कि उसमें हास्य और दृश्यात्मकता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। डॉ. देवेंद्र शर्मा और डॉ. विकास दवे के बीच संवाद ने इस विधा की संभावनाओं और प्रभाव को नई दृष्टि दी।

“कला और साहित्य का संगम” विषयक सत्र में चित्रांकन की भूमिका को रेखांकित करते हुए यह कहा गया कि चित्र केवल रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि मौन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। वहीं “अस्तित्व का संकट” विषय पर आयोजित चर्चा में पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या और उसके समाधान पर गंभीर चिंतन हुआ। वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि तकनीक से भयभीत होने के बजाय उसका सजग उपयोग आवश्यक है।

द्वितीय दिवस का प्रमुख आकर्षण “छपास की भूख” विषय पर केंद्रित सत्र रहा, जिसमें साहित्य के गिरते स्तर और संपादकीय नैतिकता पर तीखा और ईमानदार विमर्श हुआ। शोभा जैन ने मौलिकता के ह्रास पर चिंता व्यक्त करते हुए संपादकों और लेखकों दोनों को आत्मावलोकन की आवश्यकता बताई। वहीं प्रेम जनमेजय और सूर्यकांत नागर जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों ने संपादन की गरिमा, धैर्य और वस्तुनिष्ठता पर महत्वपूर्ण विचार रखे।

समापन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान, पुस्तकों का विमोचन तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने आयोजन को भावपूर्ण पूर्णता प्रदान की। डॉ. विकास दवे ने अपने उद्बोधन में इस पूरे आयोजन को साहित्यिक एकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए सभी सहभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

निस्संदेह, ‘वीणा की वाणी’ केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि साहित्यिक संवाद, आत्ममंथन और सामूहिकता की एक सशक्त पहल बनकर उभरा जहाँ पत्रिकाएँ प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक विस्तृत साहित्यिक परिवार की सदस्य के रूप में देखी गईं।

बहुत समृद्ध है सम्पादकीय परिवार 
समाज का श्रेष्ठ आचार विचार 
भाषा बोलियो संग होगा सत्कार 
देवी माँ पहनाये स्वयं कंठहार।।

दहलीज लाँघ जो आये है 
तो आँगन साहित्य कुटीर बनाएंगे 
जो दुस्साहस किया नारी शक्ति के लिए 
भर भर शब्दों की मिट्टी 
तुम्हारी दीवारों मे भर आएंगे।।

चलो बंधु एक नया पथ हमने पाया 
पाथेय के लिए एक कौर हिन्दी का पाया 
न रुकेंगे न झुकेंगे दोस्तों 
आसमान भी देखे ये कहा से आकाश है आया।।

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