इंदौर। 'वीणा की वाणी’ शीर्षक से आयोजित दो दिवसीय (30 व 31 मार्च)साहित्यिक सम्मेलन में देशभर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं पर व्यापक और गंभीर विमर्श हुआ। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्य, पत्रकारिता और तकनीक के बदलते संबंधों पर गहन चर्चा की गई।
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| 'वीणा की वाणी' विषय पर दो दिवसीय पत्र-पत्रिकाओं का विमर्श |
उद्घाटन सत्र में निदेशक डॉ. विकास दवे ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रतिस्पर्धा की दौड़ से बाहर निकालकर एक परिवार के रूप में जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने समरसता और सहयोग की भावना पर बल देते हुए लघु पत्रिकाओं की चुनौतियों को भी रेखांकित किया। ‘वीणा’ पत्रिका के संपादक राकेश शर्मा ने “साहित्य स्थायी पत्रकारिता है” कहते हुए संवेदनशील और मौलिक लेखन की महत्ता को रेखांकित किया।
सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में पत्रिकाओं के लेआउट, कंटेंट, संपादन, तकनीकी प्रभाव, कार्टून और चित्रांकन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। “जो दिखता है वही बिकता है” विषय पर विशेषज्ञों ने पत्रिका के आकर्षक आवरण और प्रस्तुतीकरण को उसकी सफलता का महत्वपूर्ण आधार बताया। साथ ही यह भी माना गया कि तकनीक ने कार्य को आसान बनाया है, लेकिन गुणवत्ता और शुद्धता बनाए रखना आज भी बड़ी चुनौती है।
द्वितीय दिवस में ‘छपास की भूख’ विषय पर चर्चा करते हुए साहित्य में गिरती गुणवत्ता, मौलिकता के अभाव और संपादकीय नैतिकता पर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि एक आदर्श संपादक के लिए बहुश्रुत, बहुपठित और निष्पक्ष होना आवश्यक है।
समापन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान किया गया तथा साहित्यिक एकता और गुणवत्ता बनाए रखने का संदेश दिया गया।
निर्माण पत्रिका के संपादक जसराज बिश्नोई ने बताया कि यह सम्मेलन अत्यंत सार्थक एवं ज्ञानवर्धक रहा, जिसमें साहित्यिक पत्रिकाओं की वर्तमान चुनौतियों, तकनीकी परिवर्तनों और भविष्य की दिशा पर गंभीर मंथन हुआ। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन पत्रिकाओं के बीच समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ संपादकों और रचनाकारों को नई दृष्टि प्रदान करते हैं।

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