इंदौर / समकालीन समय में जब सूचना, संचार और विचारों का प्रवाह अभूतपूर्व गति से हो रहा है, तब संपादकीय कर्म की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण, जटिल और जिम्मेदार बन गई है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ केवल रचनाओं के प्रकाशन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि वे समाज की बौद्धिक चेतना, वैचारिक दिशा और सांस्कृतिक संवाद की आधारशिला के रूप में कार्य कर रही हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि संपादकों के सामने अनेक नई चुनौतियाँ उपस्थित हों—चाहे वे सामग्री की गुणवत्ता से जुड़ी हों, तकनीकी बदलावों से, आर्थिक संसाधनों की कमी से, या बदलती पाठकीय रुचियों से। इन चुनौति…
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